आंखों से दिव्यांग इस किसान ने उगाये 200 से ज्यादा देशी किस्म के फसल, देश के कोने-कोने में करते हैं बीज दान-

1927

हमारे मन मे हमेशा दिव्यांगों के प्रति दया भाव रहती हैं। हम ऐसा सोचते है कि कोई दिव्यांग है तो वो कुछ नही कर सकता हैं। परंतु अगर आपमें “दृढ़ निश्चय” हो तो ये मायने नही रखता है कि आप दिव्यांग है या नहीं।

Kheti trend आज अपमो ऐसी हु किसान की कहानी बताने जा रहा है जो देख नही सकते हैं।

प्रकाश सिंह रधुवंशी जिनकी उम्र 60 वर्ष है । प्रकाश उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के तड़ीया गांव में रहते हैं।प्रकाश का एक ही नारा है” अपनी खेती,अपनी बीज,अपनी खाद,अपना स्वाद”।प्रकाश ने 8वीं तक ही पढ़ाई की हैं। परंतु आज प्रकाश जैविक खेती के साथ-साथ बीज उत्पादक भी हैं। प्रकाश 24 सालों से प्रकीर्तिक ढंग से स्वदेशी बीज की प्रजातियों को विकसित कर रहे हैं ।

दिव्यांग होने के बाद भी दूसरे को कजेत रहे है शिक्षित:-

प्रकाश सब्जियों के साथ -साथ गेहूं, धान, दाल के बीजो की अलग-अलग किस्म तैयार कर कर देश-विदेश के किसानों को प्रकीर्तिक खेती के साथ-साथ बीज तैयार करना भी सीख रहे हैं।प्रकाश के “बिजदान महादान” अभियान के अन्तर्गत प्रकाश ने 10 हज़ार किलोमीटर से भी ज्यादा भ्रमण किया हैं।और पूरे देश मे मुफ्त में स्वदेशी बीज किसानो को बाटे हैं।आज बहुत
किसान उनके घर जाकर मुफ्त में “बीज बैंक“से बीज ले जाते हैं।

प्रकाश ने अपने पिताजी से प्रकीर्तिक रूप से बीज विकसित करना सीख हैं।प्रकाश के पिताजी शिक्षक थे साथ ही साथ किसानी भी करते थे।

कहाँ से हुई शुरुआत:-

1964-65 का दौर था भारत मे गेंहू के बीज के नए-नए किस्मे आ रही थी।प्रकाश के पिताजी ने किसानों की मदद करने की भवना से बीजो का प्रचार शुरू किया। प्रकाश के पिताजी बहुत से कृषि मेलों में गए वहाँ उन्होंने किसानों को अपने बीज बात कर प्रोत्साहित कर इन बीजो की खेतु करने के लिए कहा।

प्रकाश के पिताजी ने आने सभी बच्चों को शिक्षित किया। परंतु दुर्भाग्यवश एज दुर्घटना की वजह से प्रकाश सिंह की पढ़ाई बीच मे ही छूट गयी।1977 में प्रकाश की हालत और दयनीय हो गयउ तब पेंसिलिन के इंजेक्शन का रिएक्शन हो गया और 6 महीने प्रकाश की अस्पताल में रहना पड़ा। इस का असर प्रकाश की आंखों पर पड़ा।

प्रकाश के आंखों के अंदर घाव हो गया था। रिएक्शन इतना गहरा था कि प्रकाश के पलको के बल भी आंखों की पुतलु में चिपकने लगे थे ।इस वजह से हर 3-4 दिन में उनकी पलको के बल काटे जाते थे ।इससे बाहर आने में प्रकाश को काफी वक्त लगा।। उसी वक़्त से प्रकाश नज़र का चश्मा लगा रहे हैं। अब टी प्रकाश की आंखों की रौशनी न के बराबर हैं।

जब कोई रास्ता नही दिख रहा था तब खेती का ज्ञान काम आया:-

1976 में ही प्रकाश की शादी हो गई थी। शादी के बाद प्रकाश पर परिवार की भी जिमेदारी आ गयी थी। परंतु अपनी खराब तबियत और आंखों की कम रौशनी हो जाने की वजह से प्रकाश कुछ कर नही पाते थे ।प्रकाश मात्र ढाई एकड़ जमीन के खेती पर निर्भर थे।

परंतु प्रकाश सिंह अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देना चाहते थे। परंतु प्रकाश सिंह को कुछ समझ नही आ रहा था । परिवार वाले भी मदद नही करते थे क्योंकि उन्हें ऐसा लगता था कि प्रकाश उन पर बोझ न बन जाये।और प्रकाश भी आत्मनिर्भर होना चाहते थे।

प्रकाश सिंह सोचते थे कि मैं पढ़ा भी नही हूँ। तो ऐसा क्या करूँ मैं जिससे मेरे परिवार का खर्च चल सके।तब उन्हें अपने पिताजी से सीखी हुए पौधों को परखने के हुनर काम आया।

यहाँ से हुई नए सफर की शुरुआत:-

जब 1995 में प्रकाश अपने खेतों में गेहू के फसल को देख रहे थें। तब उन्होंने देखा कि एक पौधा दूसरे गेंहू के पौधों से अलग हैं। इस पौधे के बारे में प्रकाश ने अपने पिताजी को बताया।प्रकाश के पिताजी ने बताया की इस पौधे की किस्म बाक़ियों से अलग होगी। उसके बाद क्या था प्रकाश ने पूरी मेहनत से उस एक पौधे की देख भाल की।

बाकी पुड़ी फसल काट ली परंतु उस पौधे को थोड़ा और वक़्त चाहिए था। प्रकाश प्रतिदिन उस पौधे की देखभाल करते ताकि किसी वजह से वह पौधा न गिर जाए। जब वह पौधा तैयार हो गया।तब उन्हीने अपने पत्नी संग मिलकर बीज निकाले।इस बाली में लगभग 130 बीज मिले और पूरे पौधे 10 -12 बालियो से पूरा 1000 दाने निकले।उनकी पत्नी ने इन बीजो को संभालकर रख दिया।

प्रकाश ने अगले साल इन बीजो को लगाया और 1-2 साल इसी तरह इसकी फसल ली उसके बाद प्रकाश को अलग-अलग तरह के पौधे देखे अपने खेत में।

प्रकाश ने कृषि वैज्ञानिकों से मिलकर पूछा कि यह कैसे संभव है कि एक किस्म के फसल में दो अलग किस्म के पौधे उग जाए। वैज्ञानिकों ने प्रकाश को बताया कि यह “नेचुरल क्रॉस पोलीनेशन”से संभव हैं।

2000 तक प्रकाश ने गेहूं, धान और दालों की बहुत सारे अलग किस्मे इजाद कर ली। प्रकाश ने पहले इन अलग-अलग किस्मो का डाटा रिकॉर्ड किया ।फिर सबको अलग-अलग नाम रखा। जो सबसे पहला पौधा उन्हें अपने खेत मे मिला था उसका नाम प्रकाश ने “कुदरत” रखा।उसके बाद सबका कुदरत-7,कुदरत-9 और धान की पौधे को कुदरत-1,कुदरत-2 और लाल बासमती नाम दिया।

प्रकाश ने अभी तक गेहूं की 80, धान की 25, और दाल की 10 से भी ज्यादा सरसो और मटर इत्यादि की 200 से अधिक किस्म के स्वदेसी बिज की खोज कर चुके हैं। प्रकाश इन बीजो को जैविक खाद से तैयार करते है।प्रकाश के नाम 6 फ़ीट की लौकी का बीज तैयार करने का भी रिकॉर्ड हैं।

दुसरो को भी लाभ पहुचाने की सोच:-

2003 में प्रकाश अपने बीजो और कुछ फसलों के पौधे लेकर महाराष्ट्र के पुणे के कृषि मेला गए।यहाँ उन्हें बिना किसी शुल्क के सटॉल लगाने की अनुमति मिल गई। प्रकाश सिंह की आंख की रौशनी कम होने के बाद भी वह अपने खेत मे अलग तरह के फसल पहचान लेते थे। यह भगवान का दिया आशीर्वाद था प्रकाश के लिए। दूसरों की सहायता करने के सोच से प्रकाश ने “बिजदान अभियान”शुरु किया।

कई अवार्डों से किये गए सम्मनित:-

पुणे में जिन्हें भी प्रकाश ने बीज दिए थे उन्हें काफी फायदा हुआ। किसानो ने उन्हें संपर्क कर के कई जगह सम्मानित भी किया। आज भी प्रकाश “बिजदान महादान”कर रहे हैं।पूरे देश मे किसान उन्हें जानते हैं।जैसे “राष्ट्रीय अस्मिता मंच”,”माधवाश्रम” से प्रकाश का टाई-अप हैं।

इन सब के जरिये प्रकाश किसानों तक बीज पहुँचाते हैं। प्रकाश की बहुत लोगो ने आर्थिक मदद भी की।प्रकाश का कहना है कि बहुत लोगो के गुप्त दान की वजह से उन्हें इतनी सफलता मिली। प्रकाश ने अपनी पत्नी शंकुन्तला के नाम से “स्वदेसी बीज बैंक”शुरु किया।

प्रकाश को “नेशनल इनोवेशन अवार्ड”भी मिला।2007 में हनीबी के नेटवर्क के संस्थापक अनिल गुप्ता से मुलाकात हुई और उन्होंने ही इस अवार्ड के लिए प्रयास किया।

फिर 2005 में प्रकाश को वंदना शिवा के साथ इटली जाने का मौका मिला।प्रकाश ने आने देसी बीजो और जैविक खेती करने के लिए सब को प्रोत्साहित किया।प्रकाश ने किसानों के आत्महत्या रोकने के लिए भी अभियान चलाया।

“नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन”ने प्रकाश के बीजो को पेटेंट भी करवा दिया।कई प्राइवेट कंपनिया प्रकाश के पास पेटेंट खरीदने आयी।परंतु प्रकाश ने पैसों को ठोकर मार के किसानो के बारे में सोचा और किसी को अपना पेंटेंट नही दिया।और मुफ्त में किसानों की मदद कर रहे है। क्योंकि प्रकाश का मानना है की इन बीजो पर सिर्फ किसानों का अधिकार हैं।

प्रकाश को बहुत सारे राज्यों, प्राइवेट फर्मों और सरकार ने भी अलग-अलग सम्मानों से नवाजा।प्रकाश को कुछ समय पहले ही “लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड“मिला है। आज विदेशी किसान भी प्रकाश से ट्रेनिंग लेते हैं।

अपना पूरा जीवन प्रकाश ने किसानों को समर्पित किया हैं। प्रकाश का मानना है कि आज भी देश मे अच्छे लोग है। बस आपको पहचानना है कोई बुरा नही होता है।बस उसकी परिस्थितियां उससे बुरा काम करवाती है इसलिए हमें हमेशा सब की मदद करनी चाहिए।

युवओं के लिए प्रकाश का कहना है कि-“पूर्वजों का परंपरागत ज्ञान ही हमारे भविष्य की पूंजी हैं”। हमें इसे आगे बढ़ना चाहिए।आप अपने इरादे मजबूत रखे और खुद से बीज विकशित करें। जिन्हें परेशनी आती हौ वो मुझसे संपर्क करें।

प्रकाश अब अपना बीजो के रख-रखाव के लिए ट्रस्ट बनाना चाहते है।वह अपने विकसित बीज को भविष्य के लिए सहेज कर रखना चाहते हैं।जहाँ वो प्रकीर्तिक तरीके से बीज विकसित करने की ट्रेनिंग दे सकें। लेकिन इस उद्देश्य के लिए प्रकाश को लोगो की सहयोग की जरूरत हैं।

Kheti trend प्रकाश सिंह रघुवंशी के जज्बे को सलाम करता हैं। और सबसे उम्मीद करता है कि आप सब प्रकाश की मदद करे उनके सपने को साकार करने में। प्रकाश को आप 9839253974 पर संपर्क कर के आर्थिक मदद कर सकते हैं।

अनामिका बिहार के एक छोटे से शहर छपरा से ताल्लुकात रखती हैं। अपनी पढाई के साथ साथ इनका समाजिक कार्यों में भी तुलनात्मक योगदान रहता है। नए लोगों से बात करना और उनके ज़िन्दगी के अनुभवों को साझा करना अनामिका को पसन्द है, जिसे यह कहानियों के माध्यम से अनेकों लोगों तक पहुंचाती हैं।

75 COMMENTS

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